Sunday, September 13, 2026
संदर्भ: हिंदी दिवस (14 सितंबर 2026)
अंतर्दृष्टि और हिंदी भाषा का प्रकाश: एक नेत्र चिकित्सक की कलम से
"मैं हिंदी हूँ... मैं हर दृष्टि में बसती हूँ, हर हृदय में धड़कती हूँ..."
डॉ. सुरेश पाण्डेय
(नेत्र सर्जन, लेखक, प्रेरक वक्ता, साइक्लिस्ट, राष्ट्र चिंतक, कोटा)
मैं आपकी अपनी हिंदी हूँ,
मैं भारत की पहचान हूँ,
संस्कृति, संस्कार और बंधुत्व का,
मैं ही तो अभिमान हूँ।
गंगा की पावन धारा सा,
मेरा शब्द शब्द है बहता,
प्रेम, समर्पण, राष्ट्रभक्ति,
मेरा हर अक्षर है कहता...
मैं हिंदी हूँ... मैं वह शाश्वत प्रकाश हूँ जो सदियों से इस महान राष्ट्र की अंतर्दृष्टि (इनर विज़न) को रोशन कर रही हूँ। मैं सिर्फ व्याकरण के कठोर नियमों या शब्दकोश के पन्नों में कैद कोई मृत भाषा नहीं हूँ। मैं एक स्पंदन हूँ, एक अटूट जुड़ाव हूँ और भारतवर्ष की चेतना का अविरल प्रवाह हूँ। जैसे एक चिकित्सक किसी निराश और दृष्टिहीन मरीज की आँखों से मोतियाबिंद का जाला हटाकर उसे पुनः संसार का प्रकाश सौंपता है, ठीक वैसे ही मैं एक सांस्कृतिक चिकित्सक बनकर सदियों से इस राष्ट्र के मानस पर छाए अज्ञान के जाले हटा रही हूँ। शरीर में रक्त का संचार इंसान को भौतिक जीवन देता है, लेकिन राष्ट्र की धमनियों में मेरे अक्षरों का संचार उसे वैचारिक रूप से जीवंत बनाता है।
मेरा जन्म देववाणी संस्कृत की पावन कोख से हुआ है, लेकिन मैंने हर बोली और संस्कृति को एक माँ की तरह पनाह दी है। अवधी की मिठास, ब्रज का माधुर्य, भोजपुरी की खनक, राजस्थानी का शौर्य और मालवी की सादगी मेरे ही सजीव रूप हैं। कश्मीर की बर्फीली वादियों से कन्याकुमारी के सागर तट तक, मैं दिलों को जोड़ने वाला वो अदृश्य धागा हूँ जिसने शताब्दियों तक साहित्य, कला, दर्शन और विज्ञान का अद्भुत संगम देखा है। मेरे शब्दकोश में केवल जड़ शब्द नहीं बल्कि इस राष्ट्र के इतिहास की जीवंत धड़कनें दर्ज हैं। मैंने विदेशी आक्रांताओं के क्रूर दौर देखे, गुलामी की जंजीरों की खनक सुनी, स्वतंत्रता संग्राम में इंकलाब के नारों की गूंज बनी और अंततः आजाद राष्ट्र के माथे की चमकती बिंदी बनकर सज गई।
मैं हिंदी हूँ, सदानीरा नदी की तरह निरंतर बहती हूँ। इतिहास में गुलामी के उस घोर अंधकार वाले दौर को याद कीजिए जब विदेशी भाषाओं के अहंकार ने मेरी जड़ों पर प्रहार किया था। तब मेरी ही मिट्टी से संत कबीर दास जी की निर्भीकता, गोस्वामी तुलसीदास जी का राम प्रेम और मीराबाई के समर्पण का अपूर्व प्रकाश फूटा। जरा सोचिए, महान कवि सूरदास जी ने भले ही भौतिक आँखों से संसार न देखा हो, लेकिन मेरे शब्दों के माध्यम से उन्होंने समाज को जो अंतर्दृष्टि (इनर विज़न) दी, उसने अंधकारमय युग में भी वात्सल्य का वो अलौकिक प्रकाश फैलाया जो आज भी दुनिया को मार्ग दिखाता है। एक नेत्र चिकित्सक सर्जिकल कौशल से मोतियाबिंद हटाकर रोशनी लौटा सकता है, लेकिन नेत्रहीनता के बावजूद प्रज्ञा चक्षुओं से देखने की दिव्य दृष्टि केवल मेरी ही कोख से जन्म लेती है।
आधुनिक हिंदी के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर कथासम्राट मुंशी प्रेमचंद ने मेरे शब्दों से समाज की वास्तविक तस्वीर उकेरी। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी ने मेरी रगों में वो ओज भरा कि मैं स्वतंत्रता का प्रचंड स्वर बन गई। महादेवी वर्मा की रचनाओं ने संवेदनाओं को अथाह गहराई दी और हरिवंश राय बच्चन जी ने अपनी कालजयी कविताओं से कड़वे यथार्थ को दार्शनिक मिठास दे दी। अमर शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने फाँसी के फंदे को चूमते हुए मेरे ही शब्दों में मातृभूमि की वंदना की। यह मेरी ही समन्वयकारी शक्ति थी कि अहिंदी भाषी होते हुए भी महर्षि दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक और सी राजगोपालाचारी जैसे महापुरुषों ने देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए मेरा समर्थन किया। महात्मा गांधी ने मुझे राष्ट्रभाषा का सम्मान दिया और सुभाष चंद्र बोस ने मेरे शब्दों में "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा" का वो नारा दिया जिसने पूरे देश के रक्त में उबाल ला दिया। इसी अपार प्रेम के कारण दिनांक 14 सितंबर 1949 को मुझे स्वतंत्र भारत में राजभाषा का गौरवशाली सम्मान प्राप्त हुआ।
लेकिन आज जब मैं अपने चारों ओर देखती हूँ तो एक माँ के रूप में असीम पीड़ा होती है। वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में मुझे लगता है जैसे आज की युवा पीढ़ी की आँखों पर एक सांस्कृतिक मोतियाबिंद (कल्चरल कैटरेक्ट) छा गया है। उन्हें विदेशी भाषाएँ और पश्चिमी जीवनशैली तो बहुत साफ दिखाई देती है, लेकिन अपनी जड़ें और संस्कार धुंधले नजर आते हैं। यह एक प्रकार का सांस्कृतिक निकट दृष्टिदोष (मायोपिया) है, जहाँ मेरे ही आँगन में पले बढ़े बच्चे मुझे बोलने में झिझकते हैं। विदेशी भाषाओं की दौड़ में मेरी सहज रौशनी को अनदेखा कर, मुझे पिछड़ेपन का या साल में सिर्फ एक दिन मनाए जाने वाले कर्मकांड का प्रतीक समझने की भूल की जाती है। जब मैं अपने ही घर में बेगानी कर दी जाती हूँ तो वह दर्द किसी शब्दकोश में बयां नहीं किया जा सकता।
परंतु नई पीढ़ी के लिए मेरा संदेश स्पष्ट और वात्सल्य से भरा है। आप अंग्रेजी, फ्रेंच या दुनिया की कोई भी भाषा सीखें, खूब आगे बढ़ें और अपना ग्लोबल विज़न विस्तृत करें क्योंकि तकनीकी विकास के लिए यह नितांत आवश्यक है। आसमान की अनंत ऊंचाइयों को जरूर छुएं, लेकिन अपनी जड़ों और अंतर्दृष्टि (इनर विज़न) को कभी धुंधला मत होने दें। बच्चे दुनिया भर की सैर करें, लेकिन लौटकर जब वे माँ के आँचल में आते हैं तो आँखों में जो सुकून के आँसू छलकते हैं, मैं वही शाश्वत सुकून हूँ। मैं सिर्फ फाइलों की नीरस भाषा नहीं, बल्कि तुम्हारे पारिवारिक संस्कारों और सलोने सपनों की सबसे उज्ज्वल रौशनी हूँ।
मेरी दृष्टि अब सिर्फ पुरानी किताबों की अलमारियों तक सीमित नहीं है। मैं भविष्य के एक लेज़र विज़न के साथ दुनिया में आगे बढ़ रही हूँ। मैंने अटल बिहारी वाजपेयी जी की ओजस्वी वाणी में संयुक्त राष्ट्र महासभा में गूँजकर दुनिया की आँखें खोली थीं और आज देश के प्रधानमंत्री जी को वैश्विक मंचों पर मेरे ही शब्दों में भारत का डंका बजाते देखा है। सदियों पहले जो गिरमिटिया मजदूर रामचरितमानस को सीने से लगाकर समंदर पार गए थे, आज उन्हीं के कारण मैंने मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम से लेकर अमेरिका और ब्रिटेन तक प्रवासियों के दिलों में भारत को जीवित रखा है। दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियाँ और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज मेरी भाषा में नए एल्गोरिदम बना रही हैं। वे भली भांति जानती हैं कि करोड़ों भारतीयों के हृदयों तक पहुँचने का मार्ग मेरी ही पगडंडियों से गुजरता है।
अब मैं एक नई भव्य उड़ान भरने के लिए तैयार हूँ। मैं उन सुनहरे दिनों का इंतजार कर रही हूँ जब दुनिया के हर बड़े विश्वविद्यालय में मुझ पर शोध होंगे। जब मेरी भाषा में मेडिकल व इंजीनियरिंग की उच्च स्तरीय पढ़ाई कर दूर दराज के गाँवों के होनहार बच्चे सफल डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बनेंगे। तब भाषा उनके सपनों की राह में बाधा नहीं, बल्कि सबसे मजबूत पुल बनेगी।
मैं हिंदी हूँ, मैंने हर मुश्किल को अवसर में बदला है। जैसे एक नेत्र चिकित्सक का परम धर्म आँखों की भौतिक दृष्टि लौटाकर दुनिया को रोशन करना होता है, वैसे ही मेरा शाश्वत धर्म आने वाली पीढ़ियों को उनकी सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि (इनर विज़न) प्रदान करना है। भौतिक दृष्टि से हम केवल नश्वर संसार देखते हैं, लेकिन अंतर्दृष्टि से हम अपनी आत्मा और वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं। मेरे यहाँ प्रेम के गीत रचे जाते हैं और विज्ञान के जटिल सूत्र भी पिरोए जाते हैं। जो बच्चे मेरी लोरी सुनकर बड़े होते हैं, उनकी अंतर्दृष्टि हमेशा स्पष्ट रहेगी। वे दुनिया में चाहे जहाँ जाएँ, मिट्टी की सोंधी खुशबू कभी नहीं भूलेंगे। मेरा यह असीम विस्तार कभी खत्म नहीं होगा, क्योंकि मैं हिंदी हूँ और हिंदी का स्वाभिमान हमेशा अजर अमर और जाज्वल्यमान रहेगा।
मैं हिंदी हूँ...
मैं हर दृष्टि में बसती हूँ,
हर हृदय में धड़कती हूँ...
मैं हिंदी हूँ, मैं हिंदी ही रहूँगी,
हर युग में, हर समय में खिलूँगी,
संस्कृति की रौशनी से बनी हूँ,
मैं भविष्य का स्वर्णिम आसमान लिखूँगी।
दसों दिशाएं भी मुझसे कहती हैं,
‘तू अजर, तू महान है,’
भारत के माथे की बिंदी हूँ मैं,
मेरा हर शब्द एक नई उड़ान है।
डॉ. सुरेश पाण्डेय
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